पुस्तक समीक्षा
“शिक्षक होने का अर्थ”
मेरे अनुभवों के कुछ अनकहे सत्य
| राजमंगल प्रकाशन |
2026
एक शिक्षक के 10–12 वर्षों के वास्तविक अनुभव, कक्षा में किए गए प्रयोग, सफलताएँ, असफलताएँ और उन सब से पैदा हुए सवालों से निकली एक किताब।
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पुस्तक की विस्तृत जानकारी
पुस्तक का नाम— शिक्षक होने का अर्थ : मेरे अनुभवों के कुछ अनकहे सत्य
लेखक— प्रमोद गौड़
प्रकाशक— राजमंगल प्रकाशन
भाषा— हिंदी
संस्करण— प्रथम संस्करण
प्रकाशन वर्ष — 2026
पृष्ठ— 244
ISBN-13 9789347971426
ISBN-10 9347971421
प्रारूप— Paperback
किताब की विषय सूची-1
किताब की विषय सूची-2
अंदर के पृष्ठ
यह किताब आखिर किस बारे में है?
“यह पुस्तक किनके लिए है?”
उन सभी लोगों के लिए जिन्हें कभी यह सवाल परेशान करता रहा है कि स्कूल में बच्चों के साथ वास्तव में क्या होता है।
शिक्षक, अभिभावक, विद्यार्थी, शिक्षा से जुड़े लोग—और वे सामान्य पाठक भी जिन्हें मनुष्य, समाज और जीवन के भीतर छिपे सवालों पर लिखी किताबें पढ़ना पसंद है।
इस किताब में आपको मिलेगा
- कक्षा के भीतर घटे वास्तविक अनुभव
- बच्चों को समझने की कोशिश में किए गए प्रयोग
- अनुशासन और स्वतंत्रता के बीच का संघर्ष
- गृहकार्य, परीक्षा और अंकों को लेकर उठे सवाल
- शिक्षक और विद्यार्थी के रिश्ते की वास्तविक परिस्थितियाँ
- अपनी ही गलतियों और असफलताओं से मिली सीख
- और शिक्षा-व्यवस्था को लेकर कुछ ऐसे सवाल, जिनके जवाब शायद इतने आसान नहीं हैं।
इस किताब को पढ़ने का अनुभव कैसा है?
“पुस्तक क्यों पढ़ें?”
क्योंकि शिक्षा को केवल बाहर से देखने और कक्षा के भीतर रहकर उसे देखने में बहुत अन्तर होता है।
एक शिक्षक जब वर्षों तक बच्चों के साथ रहता है, अलग-अलग शिक्षण-पद्धतियाँ आजमाता है, अपनी सफलताओं और असफलताओं को देखता है और फिर पीछे मुड़कर उन अनुभवों को समझने की कोशिश करता है, तो शिक्षा की कई ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं जो सामान्य चर्चा में दिखाई नहीं देतीं।
यह पुस्तक उसी भीतर की दुनिया को समझने का एक प्रयास है।
पुस्तक से एक छोटा अंश
मैं स्कूलों के उन अधिकांश नियमों से कभी पूर्ण सहमत नहीं हो पाता हूँ, जो लगभग हर स्कूल की एक संस्कृति होते हैं। कभी-कभी लगता है कि इनमें बच्चों की सहजता, शिक्षक की स्वतंत्रता और शिक्षण की आत्मा कहीं खो जाती है। पर सच्चाई यह है कि स्कूली परंपराएँ पत्थर की लकीर होतीं हैं—उन्हें एक अकेला शिक्षक न तो बदल सकता है, और न ही उनके खि़लाफ़ बहुत दूर तक चल सकता है। मन कितना ही विरोध करे, पर व्यवस्था अपनी जगह ज्यों की त्यों रहती है।
भारत में ज़्यादातर स्कूल एक ही ढर्रे के दिखाई देते हैं—कठोर और वर्षों से जमी हुई परंपराएँ, जिन्हें बिना सवाल किए पीढ़ी-दर-पीढ़ी ढोया जा रहा है। वहाँ सीखने का मुख्य साधन ‘रटंत’ बन चुका है, जहाँ समझ से ज़्यादा याद रखने की क़़ीमत है। बच्चों से अपेक्षा की जाती है कि वे प्रश्न न करें, बस दिए गए उत्तर सही ढंग से दोहरा दें। कठोर अनुशासन के नाम पर कक्षा में सन्नाटा अनिवार्य कर दिया जाता है, मानो चुप्पी ही पढ़ाई की पहचान हो।
पाठ्यक्रम पहले से तय होता है—बच्चों की रुचि, उनकी गति और उनकी पृष्ठभूमि से अलग। शिक्षक पर दबाव होता है कि वह समय पर पाठ्यक्रम “पूरा” करे। शिक्षा का केंद्र धीरे-धीरे परीक्षा बन जाती है, और परीक्षा का केंद्र अंक। पूरे साल की मेहनत कुछ घंटों की लिखित परीक्षा में सिमट जाती है। बच्चे सीखने के लिए नहीं, नंबर लाने के लिए पढ़ते हैं; और शिक्षक पढ़ाने के लिए नहीं, परिणाम देने के लिए।
स्कूलों की वे स्थापित परंपराएँ, वे कठोर संस्कृतियाँ, मेरे स्वतंत्रचेता स्वभाव के साथ एकाकार नहीं हो सकीं। मेरे सपनों में एक ऐसा स्कूल है जहाँ शिक्षा केवल पाठ्यपुस्तक का विषय न होकर जीवन का उत्सव हो; जहाँ बच्चे उत्तर रटने के बजाय प्रश्न पूछने का साहस करें; जहाँ पढ़ाई परीक्षा या नौकरी के लिए नहीं बल्कि जिंदगी जीने के लिए हो; जहाँ स्कूल एक सैन्य छावनी या सरकारी दफ़्तर की तरह नहीं बल्कि एक परिवार जैसी जगह हो; जहाँ भय नहीं, प्यार सिखाया जाए; जहाँ हर मुस्कान को उतनी ही गंभीरता से सुना जाए, जितनी किसी परीक्षा के परिणाम को।
मेरे शिक्षक जीवन का सबसे बड़ा तोहफ़ा है—यह एहसास, कि शिक्षक की योग्यता कक्षा को डराकर नियंत्रित कर सकने, किताबें रटवाने, अच्छे नंबर दिलाने या अच्छी नौकरी दिलवाने में नहीं, बल्कि कुछ सोच सकने वाले, कुछ रच सकने वाले या दुनिया को प्यार की भाषा समझा सकने वाले शिष्यों को गढ़ने में है। और ज़्यादातर संस्थानों को यह पसंद नहीं है कि उनके व्यावसायिक स्कूल में ‘सिलेबस’ से ज़्यादा तवज्जो समझ को दी जाए, होशियारी या चतुरता से ज्यादा भावनाओं का राज़ हो, या छात्रों के अंदर कागज़ी ‘ग्रेड’ से ज्यादा जिज्ञासा, प्रश्न, स्वतंत्रता और प्रेम पनपे।…..
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
“शिक्षक होने का अर्थ” पुस्तक किस विषय पर है?
यह पुस्तक एक शिक्षक के 10–12 वर्षों के अध्यापन अनुभवों, कक्षा में किए गए प्रयोगों और शिक्षा से जुड़े उनके विचारों पर आधारित है।
क्या यह पुस्तक Fiction है?
नहीं। पुस्तक की प्रस्तुति आत्मकथात्मक और कथात्मक है, लेकिन इसमें वर्णित अनुभव वास्तविक अध्यापन-अनुभवों पर आधारित हैं। इसकी प्रकृति गैर-कथा (Non-Fiction) और शिक्षा-विषयक है।
यह पुस्तक किन लोगों को पढ़नी चाहिए?
यह मुख्य रूप से शिक्षकों, शिक्षक-प्रशिक्षुओं, अभिभावकों और शिक्षा में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए है।
पुस्तक कितने पृष्ठों की है?
पुस्तक के वर्तमान प्रथम संस्करण में 244 पृष्ठ हैं।
पुस्तक का ISBN क्या है?
ISBN-13: 9789347971426
पुस्तक कहाँ से खरीदी जा सकती है?
किताब निम्नलिखित Platform से खरीदी जा सकती है—
