आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र मनुष्य की ‘मोह-निद्रा’ को तोड़ने वाला एक आध्यात्मिक प्रहार है। यह हमें कठोरता से याद दिलाता है कि जिस शरीर, संपत्ति और रिश्तों के अहंकार में हम डूबे हैं, वे सब ढलती शाम की परछाईं की तरह नश्वर हैं। जब बुढ़ापा घेरता है और प्राण निकलते हैं, तब न सांसारिक सुख काम आते हैं और न ही सगे-संबंधी। यह स्तोत्र हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए है—कि हम बाहरी दिखावे और व्यर्थ की चिंताओं को छोड़कर उस शाश्वत ‘गोविन्द’ (आत्म-तत्त्व) को पहचानें, क्योंकि केवल आत्म-ज्ञान ही वह नौका है जो हमें इस संसार के चक्र से मुक्ति दिला सकती है।
यहाँ प्रस्तुत है अत्यंत सरल भाषा में इसका अर्थ के साथ मूल संस्कृत स्तोत्र—
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शिवमानसपूजा
शिवमानसपूजा भक्ति मार्ग की वह पराकाष्ठा है जहाँ भक्त को ईश्वर की आराधना के लिए किसी बाहरी वस्तु, मंदिर या धन की आवश्यकता नहीं होती। आदि शंकराचार्य हमें सिखाते हैं कि सच्चा मंदिर हमारा अंतर्मन है और सच्ची सेवा हमारे शुद्ध विचार हैं। यह स्तोत्र सिद्ध करता है कि परमात्मा बाहरी कर्मकांडों के भूखे नहीं, बल्कि मन के उस भाव के भूखे हैं जहाँ हमारी हर क्रिया उनकी पूजा बन जाए और हमारी आत्मा ही उनका निवास स्थान।
यहाँ प्रस्तुत है हिंदी में अर्थ के साथ मूल संस्कृत स्तोत्र—
भारत की ज्ञान-परम्परा को समझने के लिए “किताब” शब्द को उसके आधुनिक, सीमित अर्थ में लेना एक बड़ी भूल होगी। भारत में ग्रंथ केवल सूचना-संग्रह नहीं रहे, बल्कि वे स्मृति, साधना और परम्परा के वाहक रहे हैं। इस लेख में हम ताड़पत्र, भोजपत्र, काग़ज़, प्रिंटेड पुस्तक और डिजिटल ग्रंथ—इन सभी माध्यमों को एक साथ रखकर, […]
आयुर्वेद का विकृतिकरण
आज आयुर्वेद की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं। अक्सर कहा जाता है कि आयुर्वेद काम नहीं करता, कि वैद्य भरोसेमंद नहीं रहे, कि गंभीर रोगों में अंततः एलोपैथी की शरण लेनी ही पड़ती है। अनेक रोगी आयुर्वेदिक उपचार से निराश होकर आधुनिक चिकित्सा की ओर चले जाते हैं और फिर उसी अनुभव को आयुर्वेद […]
संस्कृत को जन-भाषा बनाने की भूल
संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाने की अवधारणा कितनी सही है? क्या इससे संस्कृत को कुछ लाभ हो सकता है? इतिहास क्या कहता है? विस्तार से इस लेख में…………
संस्कृत के नाम पर
संस्कृत के प्रति उदासीनता आज शिक्षा और समाज में एक जुमला बहुत सहजता से उछाल दिया जाता है कि छात्रों, अभिभावकों या समाज की संस्कृत में रुचि नहीं होती या वे उसे उपेक्षा की नज़र से देखते हैं, कि आखिर क्या करेेंगे संस्कृत पढकर? यह वाक्य अब इतना प्रचलित हो चुका है कि इसे सत्य […]
परा-पूजा स्तोत्र
परा पूजा स्तोत्र उन लोगों के लिए है जो पूजा की गहराई को समझना चाहते हैं। यह बताता है कि असली पूजा ईश्वर को बाहरी वस्तुओं से रिझाना नहीं, बल्कि अपनी आत्मा में उस परम तत्व को महसूस करना है। यहाँ मूल स्तोत्र हिंदी अनुवाद के साथ दिया जा रहा है……..
संस्कृत—क्यों यह मात्र भाषा नहीं
क्यों यह मात्र भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है? संस्कृत मात्र एक भाषा नहीं है; यह भारतीय सभ्यता की आत्मा, ज्ञान की कुंजी और विश्व की सबसे वैज्ञानिक संपदा है। यह वह शाश्वत वाणी है जिसने न केवल भारतीय उपमहाद्वीप के दर्शन, धर्म और साहित्य को जन्म दिया, बल्कि हिंदी, मराठी, बंगाली सहित […]
