आदि शंकराचार्य द्वारा रचित यह स्तोत्र मनुष्य की ‘मोह-निद्रा’ को तोड़ने वाला एक आध्यात्मिक प्रहार है। यह हमें कठोरता से याद दिलाता है कि जिस शरीर, संपत्ति और रिश्तों के अहंकार में हम डूबे हैं, वे सब ढलती शाम की परछाईं की तरह नश्वर हैं। जब बुढ़ापा घेरता है और प्राण निकलते हैं, तब न सांसारिक सुख काम आते हैं और न ही सगे-संबंधी। यह स्तोत्र हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि जगाने के लिए है—कि हम बाहरी दिखावे और व्यर्थ की चिंताओं को छोड़कर उस शाश्वत ‘गोविन्द’ (आत्म-तत्त्व) को पहचानें, क्योंकि केवल आत्म-ज्ञान ही वह नौका है जो हमें इस संसार के चक्र से मुक्ति दिला सकती है।
यहाँ प्रस्तुत है अत्यंत सरल भाषा में इसका अर्थ के साथ मूल संस्कृत स्तोत्र—
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