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क्या ईश्वर है?

शुद्ध नास्तिकता उतनी ख़तरनाक नहीं होती, जितनी मान्यताओं पर आधारित आस्तिकता। क्योंकि ‘मान लेना’ स्वयं में अंधविश्वास की भूमि तैयार करता है। जहाँ प्रश्न करने के स्थान पर स्वीकार करने की प्रवृत्ति प्रबल हो जाती है, वहाँ बुद्धि का विकास रुकने लगता है। ऐसी सभ्यताओं में न तो खोजी प्रवृत्ति पनपती है, न रचनात्मकता, और […]

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