भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में पूजा का सामान्य स्वरूप प्रायः बाह्य कर्मकाण्ड, विधि-विधान और प्रतीकों के माध्यम से समझा जाता रहा है। कालान्तर में यही प्रतीक और विधियाँ अनेक बार साध्य के स्थान पर साधन बन गईं, जिससे ईश्वर-बोध की मूल चेतना धूमिल होती चली गई।
परा पूजा स्तोत्र आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक प्रमुख अद्वैत वेदांतिक स्तोत्र है, जो इसी पृष्ठभूमि में एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तात्त्विक घोषणापत्र के रूप में सामने आता है। यह स्तोत्र न तो ईश्वर का निषेध करता है और न पूजा का, बल्कि ईश्वर के प्रति बनी हुई उन भ्रान्त धारणाओं का शास्त्रीय निराकरण करता है, जिनमें ईश्वर को सीमित, सापेक्ष, आवश्यकता-ग्रस्त और मानव-सदृश मान लिया गया है।
यह स्तोत्र ईश्वर को अखण्ड, सच्चिदानन्द, निर्विकल्प और अद्वितीय सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है और इसी आधार पर यह प्रश्न उठाता है कि ऐसी सत्ता की पूजा बाह्य विधानों से कैसे संभव हो सकती है। जो स्वयं पूर्ण है उसे आवाहन की आवश्यकता नहीं, जो सर्वाधार है उसे आसन नहीं दिया जा सकता और जो नित्य शुद्ध है उसे शुद्ध करने की क्रियाएँ अर्थहीन हैं। इस दृष्टि से परा-पूजा स्तोत्र उन अंधविश्वासों का मौन किंतु दृढ़ खंडन करता है जिनमें ईश्वर को भूख-प्यास, प्रसन्नता-अप्रसन्नता, शुद्धता-अशुद्धता तथा सामाजिक पहचान से युक्त मान लिया गया है। यहाँ ईश्वर न किसी वर्ण, गोत्र या रूप में सीमित है और न ही इन्द्रियजन्य भोग, अलंकार या स्तुति पर आश्रित।
परा-पूजा स्तोत्र का केन्द्रीय तात्त्विक आग्रह यह है कि पूजा ईश्वर को प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि ईश्वर-बोध की अवस्था है। धूप, दीप, नैवेद्य, आरती और विसर्जन जैसी क्रियाएँ यदि विवेक से रहित हों तो वे साधना नहीं, बल्कि प्रतीकों का अंधानुकरण बन जाती हैं। इस स्तोत्र में ईश्वर को स्वयंप्रकाश चैतन्य स्वीकार किया गया है, जिसके सामने प्रकाश दिखाना, शब्दों से स्तुति करना या उसे बुलाकर विदा करना तर्कसंगत नहीं रह जाता। यहाँ पूजा का रूपांतरण कर्म से चेतना की ओर, और विधि से दृष्टि की ओर होता है।
अंततः यह स्तोत्र साधक को यह बोध कराता है कि सच्ची पूजा किसी एक क्षण या स्थान की क्रिया नहीं, बल्कि जीवन की अखण्ड अवस्था है, जहाँ आत्मा शिवरूप है, बुद्धि शक्ति है, शरीर मंदिर है और जीवन की समस्त क्रियाएँ आराधना बन जाती हैं। इस प्रकार परा-पूजा स्तोत्र भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में पूजा की उस परिपक्व अवधारणा को प्रस्तुत करता है, जहाँ अंधविश्वास, भय और लेन-देन से मुक्त होकर ईश्वर-बोध को जीवन का स्वाभाविक सत्य बना दिया जाता है।
नीचे हिंदी अनुवाद के साथ संपूर्ण स्तोत्र प्रस्तुत है—
अखण्डे सच्चिदानन्दे निर्विकल्पैक-रूपिणि।
स्थितेऽद्वितीय-भावेऽस्मिन् कथं पूजा विधीयते ।।१।।
जो अखण्ड, सच्चिदानन्द, निर्विकल्प और अद्वितीय ब्रह्म है—
उसमें पूजा कैसे की जा सकती है?
पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम्।
स्वच्छस्य पाद्यमर्घ्यं च शुद्धस्याचमनं कुतः ।।२।।
जो पहले से ही पूर्ण है—उसे बुलाया कहाँ जाए?
जो सबका आधार है—उसे आसन कहाँ दें?
जो स्वच्छ और शुद्ध है—उसे पाद्य, अर्घ्य, आचमन क्यों?
निर्मलस्य कुतः स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च।
अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ।।३।।
जो निर्मल है—उसका स्नान कैसा?
जो पूरे विश्व को धारण करता है—उसे वस्त्र कैसे?
जिसका न गोत्र है न वर्ण—उसे यज्ञोपवीत क्यों?
निर्लेपस्य कुतो गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य च।
निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलंकारो निराकृतेः ।।४।।
जो लेप से रहित है—उसमें गन्ध कैसी?
जो वासना-रहित है—उसे पुष्प क्यों?
जो निराकार है—उसे आभूषण कैसे?
निरंजनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्व-साक्षिणः।
निजानन्दैक-तृप्तस्य नैवेद्यं किं भवेदिह ।।५।।
जो निरञ्जन और सर्वसाक्षी है—उसे धूप-दीप क्यों?
जो अपने ही आनन्द से तृप्त है—उसे भोग क्या दिया जाए?
विश्वानन्द-पितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते।
स्वयं-प्रकाश-चिद्रूपो योऽसावर्कादि-भासकः।।६।।
जो स्वयं प्रकाश है और सूर्य आदि को प्रकाशित करता है, जो सम्पूर्ण आनन्द का जनक है—उसे ताम्बूल क्या?
प्रदक्षिणा ह्यनन्तस्य ह्यद्वयस्य कुतो नतिः ।
वेद-वाक्यैरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते।।७।।
जो अनन्त ब्रह्म है—उसकी परिक्रमा कैसी?
जो अद्वैत है—उसे प्रणाम कैसे?
जो वेदों से भी अवेद्य है—उसका स्तवन कैसे?
स्वयं प्रकाश-मानस्य कुतो नीराजनं विभोः।
अंतर्बहिश्च पूर्णस्य कथमुद्वासनं भवेत्।।८।।
जो स्वयं प्रकाशमान है—उसकी आरती क्यों?
जो भीतर-बाहर सर्वत्र पूर्ण है—उसे विसर्जित कैसे करें?
एवमेव परापूजा सर्वावस्थासु सर्वदा।
एक-बुद्ध्या तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमैः।।९।।
इसी प्रकार—
हर अवस्था में, हर समय—
एकात्मबुद्धि से परमात्मा की उपासना ही परा-पूजा है।
आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विविधोप-भोगरचना निद्रा समाधि-स्थितिः।
संचारः पदयोः प्रदक्षिण-विधिः स्तोत्राणि सर्वागिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ।।१०।।
हे शम्भो! मेरी आत्मा ही तुम हो, बुद्धि पार्वती है, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपकी कुटिया है, नाना प्रकार के भोग आपका पूजोपचार है, निद्रा समाधि है, मेरे पैरों का चलना आपकी प्रदक्षिणा है और मैं जो कुछ भी बोलता हूँ वह सब आपके स्तोत्र है, अधिक क्या? मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब आपकी आराधना है।
