अतीत के बीज, भविष्य के वृक्ष
ओशो का यह वक्तव्य ज्योतिष, समय की अनिश्चितता, और अतीत के गहरे संस्कारों (टाइम ट्रैक) के संबंध में एक गहन और मनन योग्य दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। वे पारंपरिक ज्योतिष की सीमाओं से आगे बढ़ते हुए मनुष्य के अस्तित्व के अदृश्य और गहरे आयामों की पड़ताल करते हैं।
“भविष्य एकदम अनिश्चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्चित है। हमारा अज्ञान भारी है। भविष्य में हमें कुछ दिखाई नहीं पड़ता। हम अंधे हैं। भविष्य का हमें कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। नहीं दिखाई पड़ता है इसलिए हम कहते हैं कि निश्चित नहीं है लेकिन भविष्य में दिखाई पड़ने लगे… और ज्योतिष भविष्य में देखने की प्रक्रिया है।”
ओशो शुरुआत ही एक मौलिक विचार से करते हैं: “भविष्य एकदम अनिश्चित नहीं है। हमारा ज्ञान अनिश्चित है। हमारा अज्ञान भारी है।” यह एक क्रांतिकारी बदलाव है। वे अनिश्चितता का दोष भविष्य पर नहीं, बल्कि हमारे सीमित ज्ञान और अज्ञान पर डालते हैं।
ओशो ज्योतिष को केवल ग्रह-नक्षत्रों की गणना तक सीमित नहीं मानते। वे कहते हैं कि यह उसका सिर्फ एक ‘आयाम’ है। वे भविष्य जानने के अन्य गहरे आयामों का उल्लेख करते हैं।
ओशो पश्चिम के एल. रॉन हब्बार्ड की खोज ‘टाइम ट्रैक’ (समय की धारा) और ‘इनग्रेन्स’ (संस्कार बीज) की चर्चा करते हैं, जिसे वे पूरब के जाति-स्मरण (महावीर द्वारा उल्लिखित) के समानांतर पाते हैं—
“हुब्बार्ड का ख्याल है कि प्रत्येक व्यक्ति जहां भी जिया है इस पृथ्वी पर या कहीं और किसी ग्रह पर— आदमी की तरह या जानवर की तरह या पौधे की तरह या पत्थर की तरह। आदमी जहां भी जिया है अनंत यात्रा में— उस… पूरा का पूरा टाइम ट्रैक, समय की पूरी की पूरी धारा उसके भीतर अभी भी संरक्षित है। वह धारा खोली जा सकती है और उस धारा में आदमी को पुन: प्रवाहित किया जा सकता है।”
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“हुब्बार्ड की खोजों में यह खोज बड़ी कीमत की है। इस टाइम ट्रैक पर हुब्बार्ड ने कहा है कि आदमी के भीतर इनग्रेन्स है। एक तो हमारे पास स्मृति है जिससे हम याद रखते हैं कि कल यह हुआ, परसों क्या हुआ? वह कामचलाऊ स्मृति है। वह रोज बेकार हो जाती है। वह असली नहीं है। वह स्थायी भी नहीं है। यह हमारी कामचलाऊ स्मृति है जिससे हम रोज काम करते हैं, इसे रोज फेंक देते हैं। और उससे गहरी एक स्मृति है, जो कामचलाऊ नहीं है। जो हमारे जीवन के समस्त अनुभवों का सार है, अनंत जीवन पथों पर लिए गए अनुभवों का सार इकट्ठा है।
उसे हुब्बार्ड ने इनग्रेन्स कहा है।……….उसे खोला जा सकता है। और जब उसे खोला जाता है तो महावीर उसको कहते जाति-स्मरण”
एल. रॉन हब्बार्ड ने ये अवधारणाएँ अपनी 1950 में प्रकाशित पुस्तक “डायनेटिक्स: द मॉडर्न साइंस ऑफ मेंटल हेल्थ” में प्रस्तुत की थीं। ‘टाइम ट्रैक’ से हब्बार्ड का अभिप्राय व्यक्ति के अस्तित्व के समस्त अनुभवों का क्रोनोलॉजिकल रिकॉर्ड है, जो जन्म से लेकर वर्तमान क्षण तक (और डायनेटिक्स के अनुसार, पिछले जन्मों तक) उसकी रिएक्टिव माइंड (Reactive Mind) में संग्रहीत है।
मुख्य बिंदु:
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रिकॉर्डिंग की प्रकृति: टाइम ट्रैक एक टेप रिकॉर्डर की तरह है जो व्यक्ति के जीवन के सभी क्षणों को रिकॉर्ड करता है, जिसमें सचेत और अचेत दोनों अवस्थाएँ शामिल हैं।
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अनंतता: हब्बार्ड का दावा है कि यह रिकॉर्ड सिर्फ वर्तमान जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के अतीत के सभी अस्तित्वों (Previous lives) तक फैला हुआ है, जैसा कि ओशो ने भी उल्लेख किया है।
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उद्देश्य: डायनेटिक्स की प्रक्रिया (ऑडिटिंग) में, व्यक्ति को ‘टाइम ट्रैक’ पर पीछे ले जाया जाता है ताकि वह उन विशिष्ट क्षणों को खोज सके और उनका सामना कर सके जहाँ ‘इनग्रेन्स’ (नीचे देखें) दर्ज हुए थे।
ओशो के अनुसार, ज्योतिष की गहनतम पकड़ अतीत को खोलने में है।
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तर्क: “आपका भविष्य आपके अतीत से जन्मेगा।” अतीत को जाने बिना भविष्य को नहीं जाना जा सकता।
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समीक्षा: यह विचार अत्यंत तार्किक और वैज्ञानिक है। हमारा वर्तमान कर्म और हमारा भविष्य का स्वरूप हमारे अतीत के संस्कारों और अनुभवों का ही परिणाम होता है। यदि ज्योतिष अतीत के कारणों को जान ले, तो भविष्य के प्रभावों की भविष्यवाणी करना स्वाभाविक हो जाता है। यह नियति को कर्म और संस्कार से जोड़ता है।
“डायनेटिक्स का मुख्य लक्ष्य व्यक्ति को अवांछित संवेदनाओं और भावनाओं से मुक्त करके ‘क्लियर’ (Clear) अवस्था प्राप्त करने में मदद करना है। ऐसा नहीं होता है कि आप याद कर रहे हैं— ‘यू री-लीव’। जब वह खुलती है, जब टाइम ट्रैक खुलता है तो आपको ऐसा अनुभव नहीं होता है कि मुझे याद आ रहा है। न आप पुन: जीते हैं।”
ट्रॉमा री-एक्टिवेशन (Trauma Re-activation): ट्रॉमा मनोविज्ञान (Trauma Psychology) इस बात का समर्थन करता है कि गंभीर आघात (Trauma) की स्मृति ‘कामचलाऊ’ नहीं होती। आघात (Accident, abuse) की स्मृति मस्तिष्क के हिप्पोकैंपस क्षेत्र में ठीक से प्रोसेस नहीं हो पाती।
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जब कोई व्यक्ति किसी ‘ट्रिगर’ के संपर्क में आता है, तो वह केवल आघात को याद नहीं करता, बल्कि शारीरिक रूप से पुनः जीता (Re-lives) है। इसे फ़्लैशबैक (Flashback) कहा जाता है।
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पीड़ित व्यक्ति अचानक डर, हृदय गति में वृद्धि, और शारीरिक प्रतिक्रियाएँ महसूस करता है, मानो वह आघात अभी हो रहा हो। यह ओशो के ‘यू विल री-लीव इट’ (आप इसे पुन: जिएँगे) के विचार से बहुत मेल खाता है।
“समझ लें, अगर टाइम ट्रैक आपका खोला जाए, जो कि खोलना बहुत कठिन नहीं है और ज्योतिष उसके बिना अधूरा है। ज्योतिष की बहुत गहनतम जो पकड़ है वह तो आपके अतीत के खोलने की है, क्योंकि आपके अतीत का अगर पूरा पता चल जाए तो आपका पूरा भविष्य पता चलता है, क्योंकि आपका भविष्य आपके अतीत से जन्मेगा। आपके भविष्य को आपके अतीत को जाने बिना नहीं जाना जा सकता है, क्योंकि आपका अतीत आपके भविष्य का बेटा होने वाला है। उसी से पैदा होगा। तो पहले तो आपके अतीत की पूरी स्मृति-रेखा को खोलना पड़े… अगर आपकी स्मृति रेखा को खोल दिया जाए… जिसकी प्रक्रियाएं हैं और विधियां हैं।”
कॉम्प्लेक्स सिस्टम्स और प्रेडिक्शन (समानता)
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नियतिवाद (Determinism) और अप्रत्याशितता (Unpredictability): क्लासिकल भौतिकी (Newtonian Physics) एक तरह के नियतिवाद पर आधारित थी, जहाँ यदि आप किसी क्षण में ब्रह्मांड के सभी कणों की स्थिति और गति जानते हैं, तो आप सैद्धांतिक रूप से भविष्य की गणना कर सकते हैं। ओशो का यह विचार कि “भविष्य आपके अतीत से जन्मेगा,” इस कारण-कार्य संबंध (Cause-Effect Relationship) पर आधारित है।
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केओस थ्योरी (Chaos Theory): हालांकि, आधुनिक विज्ञान (केओस थ्योरी) यह दिखाता है कि अत्यधिक जटिल प्रणालियों (Complex Systems) (जैसे मौसम या मानव मस्तिष्क) में, प्रारंभिक स्थितियों में बहुत छोटे से बदलाव भी भविष्य में बहुत बड़े, अप्रत्याशित परिणाम दे सकते हैं (तितली प्रभाव)। इसलिए, सैद्धांतिक रूप से निश्चित होने पर भी, हमारा व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) इसे अनिश्चित बना देता है। यह ओशो के “हमारा ज्ञान अनिश्चित है” के विचार को पुष्ट करता है।
“हुब्बार्ड ने हजारों लोगों की सहायता की है। जैसे एक आदमी है, जो ठीक से नहीं बोल पाता। हुब्बार्ड का कहना है कि वह बचपन की किसी स्मृति पर अटक गया है। उसके आगे नहीं बढ़ पाया है। तो वह उसके टाइम ट्रैक पर उसको वापस ले जाएगा। उसके इनग्रेन्स को तोड़ेगा और जब 6 वर्ष का हो जाएगा जहां रुक गई थी, जहां से वह आगे नहीं बढ़ा, फिर जहां वह वापस पहुंच जाएगा… टूट जाएगी धारा। वह आदमी वापस लौट आएगा। तब वह 30 साल का हो जाएगा। वह जो बीच में फासला था 24 साल का वह उसको पार कर देगा। और हैरानी की बात है कि हजारों दवाइयां उस आदमी को बोलने में समर्थ नहीं बना पाई थीं लेकिन यह टाइम ट्रैक पर लौटकर जाना और पुन: वापस लौट आना… वह आदमी बोलने में समर्थ हो जाएगा।”
हालांकि डायनेटिक्स और ‘इनग्रेन्स’ के सिद्धांतों को चिकित्सा, मनोविज्ञान या तंत्रिका विज्ञान के किसी भी मुख्यधारा के निकाय द्वारा वैज्ञानिक रूप से समर्थित नहीं किया गया है। वैज्ञानिक समुदाय इसे छद्म विज्ञान मानता है क्योंकि इसके दावों को अनुभवजन्य (Empirical) और सत्यापन योग्य (Verifiable) तरीके से सिद्ध नहीं किया जा सकता है।
परंतु ओशो के विचारों में जो सबसे अधिक वैज्ञानिक साक्ष्य से मेल खाता है, वह है आघात और अवचेतन स्मृति (Trauma and Subconscious Memory) की अवधारणा। ‘री-लीविंग’ (पुनः जीना) और मनोदैहिक बीमारियाँ वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य हैं जो बताते हैं कि हमारा अतीत हमारे शरीर और मन को वर्तमान में भी प्रभावित करता है।
ओशो का एक सबसे महत्त्वपूर्ण तर्क यह भी है कि भविष्य अनिश्चित इसलिए नहीं है क्योंकि वह यादृच्छिक (random) है, बल्कि इसलिए क्योंकि हम अपने अतीत के संस्कारों (इनग्रेन्स) के गुलाम हैं, जो हमें एक निश्चित रास्ते पर चलाते हैं।
यह एक नियतिवाद (Determinism) जैसा दृष्टिकोण है, जहाँ भविष्य सिर्फ अतीत का तार्किक परिणाम होता है। जब तक अतीत के कारण मौजूद हैं, भविष्य का प्रभाव निश्चित रहेगा।
आधुनिक विज्ञान के अनुसार भविष्य मुख्य रूप से जटिल प्रणालियों (Complex Systems) और यादृच्छिकता (Randomness) के अधीन है। और इसलिए मानव मस्तिष्क या सामाजिक घटनाओं के भविष्य को पूरी तरह से निश्चित करना वर्तमान विज्ञान के लिए असंभव है।
—सर्वाधिकार सुरक्षित—ऋतसूत्रम्
