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ज्योतिष-एक-ऐतिहासिक-गरिम

ज्योतिष-एक ऐतिहासिक गरिमा


चाहे ज्योतिष की भविष्यवाणियाँ आज सही ठहरती हों या नहीं, और चाहे ज्योतिष आज असफलता की सबसे बड़ी चोटी पर खड़ा हो, इन सभी बातों को यदि दरकिनार कर दें तो भी एक ऐतिहासिक सत्य यह भी है कि ज्योतिष सदियों तक खगोलशास्त्र, गणित, कालगणना और प्राच्य ज्ञान परंपरा के साथ सहजता से रहा है।
आर्यभट, जिन्होंने पृथ्वी की गोलता, उसका घूर्णन व ग्रहों की गति को समझा, वराहमिहिर, जिनकी ‘बृहत्संहिता’ केवल भविष्यवाणी नहीं, खगोल, भूगर्भ और वनस्पति तक का गहन अन्वेषण है, और भास्कराचार्य, जिनकी ‘लीलावती’ आज भी गणित का चमत्कार है—इन सभी ने फलित ज्योतिष को त्याज्य नहीं, एक संपूरक विद्या के रूप में स्वीकार किया।
तब यह प्रश्न स्वाभाविक है—कि ऐसा क्या परिवर्तित हुआ 20वीं सदी में, कि जिस विद्या को सहस्राब्दियों तक विद्वानों ने अन्वेषण और अनुप्रयोग की दृष्टि से अपनाया, उसे अचानक ‘छद्म विज्ञान’ की संज्ञा दे दी गई? क्या यह केवल वैज्ञानिक पद्धति की कठोर कसौटियों का परिणाम था? या फिर पश्चिमी उपनिवेशवाद, औपनिवेशिक शिक्षा-नीति और भारतीय ज्ञान परंपरा के अवमूल्यन की कोई गहरी छाया?
जातक शास्त्र के पौरुषेय ग्रंथ के आदि प्रणेता वराहमिहिर है। ब्रह्मगुप्त ने प्राचीन ज्योतिषियों में बहुत से दोष दिखलाए हैं परंतु वराह मिहिर को कहीं भी दोष नहीं दिया है। भास्कराचार्य ने उनकी स्तुति की है—

वराहमिहिरादयः समवलोक्य येषां कृतीः।
कृती भवति मादृशोऽप्यतनुतन्त्रवन्धेऽल्पधीः।।

सिद्धांत शिरोमणि, मध्यमाधिकार, कालमानाध्याय 3

अर्थात—“वराहमिहिरादि आचार्याें की प्रसिद्ध कृतियों का अच्छी तरह अवलोकन करके मुझ जैसा तन्त्रज्ञानशून्य एवं अल्पबुद्धि वाला व्यक्ति ज्तोतिषतन्त्र शास्त्र के निर्माण में समर्थ होता है।”

अन्य अनेक ग्रंथकारों ने उनके वचन प्रमाण रूप में उद्धृत किए हैं। वराह के टीकाकार भट्टोत्पल ने गर्ग, बादरायण, याज्ञवल्क्य के और मांडव्य के जातक संबंधी वचन दिए हैं। अर्थात इनके आर्ष ग्रंथ वराह से पहले के रहे होंगे। उत्पल ने वृहद् जातक 7-7 “आयुर्दायं विष्णुगुप्तोऽपि चैवं देवस्वामी सिद्धसेनश्च चक्रे” की टीका में लिखा है कि विष्णुगुप्त ही चाणक्य हैं“एतदायुर्दायं न केवलं मययवनमणीत्थशक्तिपूर्वैरुक्तं यावद् विष्णुगुप्तेन अपि चाणक्यापरनान्नैवमुक्तम्।”
अतः अनुमानतः वराह से 800 वर्ष पूर्व जातक स्कंद प्रचलित था।
वैश्विक परिदृश्य पर नज़र डालें या पाश्चात्य ज्योतिष को ही लें, उसने भी विज्ञान के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज के कई वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करने में शर्मिंदा हो सकते हैं, उदाहरण के लिए, कि 17वीं सदी के जर्मन गणितज्ञ ‘Johannes Kepler’, जिन्होंने ग्रहों की गति के नियमों की खोज की थी, ने अपने बॉस, रोमन सम्राट Rudolf-ii के लिए भी कुंडली बनाई थी।
भौतिकी में डॉक्टरेट उपाधि प्राप्त अमेरिकी डेटा वैज्ञानिक एलेक्ज़ेंडर बॉक्सर की नवीन पुस्तक ‘A Scheme of Heaven: Astrology and the Birth of Science’ इस प्रचलित दृष्टिकोण को चुनौती देती है कि ज्योतिष केवल एक अवैज्ञानिक पद्धति है। यह पुस्तक इस तथ्य की पड़ताल करती है कि ज्योतिष प्राचीन काल में, विशेष रूप से वैज्ञानिक क्रांति (17वीं शताब्दी) तक, प्राकृतिक दर्शन (natural philosophy) का एक स्वीकृत और व्यवस्थित हिस्सा था। उस युग की शुरुआत केपलर और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों ने की थी, जिनके कार्यों ने आधुनिक विज्ञान की नींव रखी।
यह सर्वविदित है कि प्राचीन मिस्रवासी ज्योतिष से बहुत जुड़े हुए थे। ‘West’ तथा ‘Toonder’ का मानना है कि“संभव है कि मिस्रवासियों को ज्योतिष का ज्ञान यूनानियों से हज़ारों वर्ष पहले ही प्राप्त हो गया था। यदि हम यह सोचते हैं कि इसका अर्थ यह है कि वे लोग किसी प्रकार के अंधविश्वासी या मूर्ख थे, तो हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि मिस्र के पिरामिडों और मंदिरों में जिस प्रकार की अद्भुत वास्तुकला और जटिल निर्माण-व्यवस्थाएँ देखने को मिलती हैं, उन्हें समझना आज भी हमारे लिए चुनौतीपूर्ण है। उनके द्वारा निर्मित कैलेंडर इतना अधिक सटीक था कि उसमें सुधार की आवश्यकता केवल आधुनिक काल में ही महसूस हुई। यह सब इस बात का प्रमाण है कि उनकी ज्योतिषीय और खगोल संबंधी समझ अत्यंत उन्नत और वैज्ञानिक थी।”

J. A. West and J. G. Toonder, The Case for Astrology,
Macdonald & Co., 1970, p.38

वे निष्कर्ष निकालते हैं कि—“प्राचीन काल से ही मिस्र का खगोल विज्ञान अत्यंत उन्नत स्तर का रहा है। ऐसा गहन विज्ञान किसी सुव्यवस्थित ‘मास्टर प्लान‘ और सुनियोजित—न कि यादृच्छिक—अवलोकन प्रणाली के बिना विकसित होना संभव ही नहीं था।“

वही p.47

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