दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिर-वसन्तौ पुनरायातः।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः॥ १॥
दिन-रात, सुबह-शाम और ऋतुएँ बार-बार आती-जाती रहती हैं। समय खेल रहा है और हमारी उम्र बीत रही है, फिर भी हमारी इच्छाओं की हवा (लालच) हमारा पीछा नहीं छोड़ती।
भज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते।
प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे॥
(ध्रुवपदम्)
हे मूर्ख मन! केवल गोविंद (ईश्वर) का नाम जप, क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम या सांसारिक रटन काम नहीं आएगी।
अग्रे वह्निः पृष्ठे भानुः रात्रौ चिबुक-समर्पित-जानुः।
करतल-भिक्षा तरुतल-वासस्तदपि न मुञ्चत्याशा-पाशः॥
भज0॥ २॥
कोई व्यक्ति जिसके आगे आग जल रही हो, पीछे सूरज तप रहा हो और रात को सर्दी से बचने के लिए घुटनों में सिर छिपाकर सोता हो; जो हाथ फैलाकर भिक्षा माँगता हो और पेड़ के नीचे रहता हो—इतनी दरिद्रता के बावजूद उसका ‘आशाओं का बंधन’ (और पाने की इच्छा) उसे नहीं छोड़ता।
यावद्-वित्तोपार्जनसक्तस् तावन्-निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाद् धावति जर्जर-देहे वार्ता पृच्छति कोऽपि न गेहे॥
भज0॥ ३॥
जब तक मनुष्य पैसा कमाने की ताकत रखता है, तब तक परिवार के लोग उससे प्रेम करते हैं। लेकिन जब बुढ़ापे के कारण शरीर जर्जर हो जाता है, तो घर का कोई सदस्य हाल-चाल भी नहीं पूछता।
जटिलो मुण्डी लुंचित-केशः काषायाम्बर-बहुकृत-वेषः।
पश्यन्नपि च न पश्यति लोको ह्युदर-निमित्तं बहुकृत-वेषः॥
भज0॥ ४॥
कोई जटा बढ़ा लेता है, कोई सिर मुंडा लेता है, तो कोई गेरुए वस्त्र पहन लेता है। ये सब ढोंगी लोग पेट भरने के लिए अनेक वेश बदलते हैं। सत्य सामने होते हुए भी ये मूर्ख उसे नहीं देख पाते।
भगवद् गीता किंचिदधीता गंगा-जल-लवकणिकापीता।
सकृदपि येन मुरारि-स्मरणं तस्य यमः किं कुरुते चर्चा॥
भज0॥ ५॥
जिसने भगवद् गीता का थोड़ा भी अध्ययन किया है, गंगाजल की एक बूंद भी पी है और एक बार भी सच्चे मन से भगवान कृष्ण का स्मरण किया है, यमराज भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते (अर्थात् उसे मोक्ष मिल जाता है)।
अंगं गलितं पलितं मुण्डं दशन-विहीनं जातं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुंचत्याशा पिण्डम्॥
भज0॥ ६॥
शरीर गल गया है, सिर के बाल सफेद हो गए हैं, मुँह दांतों से खाली हो गया है और बूढ़ा व्यक्ति लाठी पकड़कर चलता है; फिर भी मोह-माया और इच्छाओं का पिंड (लालच) उसका पीछा नहीं छोड़ता।
बालस् तावत् क्रीडासक्तस् तरुणस्तावत् तरुणीरक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तामग्नः पारे ब्रह्मणि कोऽपि न लग्नः॥
भज0॥ ७॥
बचपन खेल-कूद में बीत जाता है, जवानी स्त्री (विषय-भोग) के आकर्षण में और बुढ़ापा चिंताओं में डूब जाता है। अफसोस कि उस परब्रह्म (परमात्मा) में कोई मन नहीं लगाता।
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी-जठरे शयनम्।
इह संसारे खलु दुस्तारे कृपयापारे पाहि मुरारे॥
भज0॥ ८॥
बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना और बार-बार माँ के गर्भ में सोना—इस अपार संसार चक्र से निकलना बहुत कठिन है। हे मुरारी! अपनी कृपा से मेरी रक्षा करें और मुझे इस चक्र से मुक्त करें।
वयसि गते कः कामविकारः शुष्के नीरे कः कासारः।
नष्टे द्रव्ये कः परिवारो ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥
भज0॥ १०॥
उम्र बीत जाने पर काम-वासना कैसी? पानी सूख जाने पर तालाब कैसा? धन नष्ट हो जाने पर परिवार कैसा? और आत्म-तत्त्व (सत्य) का ज्ञान हो जाने पर यह संसार कैसा? (अर्थात् ज्ञान होने पर मोह-माया स्वतः समाप्त हो जाती है)।
नारीस्तन-भरनाभि-निवेशं मिथ्या-माया-मोहावेशम्।
एतन् मांसवसादि-विकारं मनसि विचारय वारं वारम्॥
भज0॥ ११॥
स्त्री के शरीर (स्तन और नाभि आदि) के प्रति यह आकर्षण केवल एक झूठा मोह और भ्रम है। अपने मन में बार-बार यह विचार करो कि यह देह केवल मांस, चर्बी और रक्त का एक रूप (विकार) मात्र है। (इसे जानकर आसक्ति का त्याग करो)।
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः का मे जननी को मे तातः।
इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्नविचारम्॥
भज0॥ १२॥
तुम कौन हो? मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ? मेरी माँ कौन है और पिता कौन? इस संसार को एक ‘सपने’ की तरह सारहीन समझकर इन प्रश्नों पर विचार करो और मोह त्याग दो।
गेयं गीता-नाम-सहस्रं ध्येयं श्रीपति-रूपमजस्रम्।
नेयं सज्जन-संगे चित्तं देयं दीन-जनाय च वित्तम्॥
भज0॥ १३॥
गीता का पाठ करो, विष्णु सहस्रनाम जपो, निरंतर लक्ष्मीपति (विष्णु) के रूप का ध्यान करो, अपना मन सज्जनों की संगति (सत्संग) में लगाओ और अपना धन गरीबों व जरूरतमंदों की सेवा में दान करो।
यावज्जीवो निवसति देहे कुशलं तावत् पृच्छति गेहे।
गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन् काये॥
भज0॥ १४॥
जब तक शरीर में प्राण रहते हैं, तभी तक घर के लोग हाल-चाल पूछते हैं। प्राण निकल जाने पर जब देह गिर जाती है, तो पत्नी भी उस शरीर (शव) से डरने लगती है।
सुखतः क्रियते रामाभोगः पश्चाद् हन्त शरीरे रोगः।
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुंचति पापाचरणम्॥
भज0॥ १५॥
मनुष्य सुख के लिए भोग-विलास करता है, जिसका परिणाम बाद में शरीर के रोगों के रूप में सामने आता है। यह जानते हुए भी कि अंत में मृत्यु ही शरण है, मनुष्य पाप करना नहीं छोड़ता।
रथ्याचर्पट-विरचित-कन्थः पुण्यापुण्य-विवर्जित-पन्थः।
नाहं न त्वं नायं लोकस् तदपि किमर्थं क्रियते शोकः॥
भज0॥ १६॥
फटे-पुराने कपड़ों (चिथड़ों) को जोड़कर कंथा (ओढ़ने का वस्त्र) बना लेने वाला साधक, पुण्य और पाप के बंधनों से ऊपर उठ चुका है। जब न मैं हूँ, न तुम हो और न यह संसार स्थायी है, तो फिर किस बात का दुःख (शोक) करना?
कुरुते गंगा-सागर-गमनं व्रत-परिपालनमथवा दानम्।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशतेन॥
भज0॥ १७॥
चाहे कोई गंगा-सागर की तीर्थयात्रा कर ले, कठोर व्रतों का पालन करे या खूब दान-पुण्य करे; लेकिन सभी शास्त्रों के अनुसार, आत्म-ज्ञान के बिना मनुष्य सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं पा सकता।
