Categories
अन्य लेख संस्कृत भाषा

संस्कृत को जन-भाषा बनाने की भूल

संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाने की अवधारणा कितनी सही है? क्या इससे संस्कृत को कुछ लाभ हो सकता है? इतिहास क्या कहता है? विस्तार से इस लेख में…………

ज्ञान की भाषा को भीड़ की भाषा बनाने का भ्रम

नीयत अच्छी है, दिशा गलत

हाल के वर्षों में एक उत्साह दिखाई देता है कि संस्कृत को जन-भाषा बना दिया जाए—सड़क, बाज़ार, दफ़्तर और आपसी बोलचाल की भाषा।

यह उत्साह पहली नज़र में राष्ट्रप्रेम जैसा लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह संस्कृत के स्वभाव और इतिहास—दोनों की अनदेखी करता है। हर भाषा हर प्रयोजन के लिए नहीं बनी होती। किसी भाषा को सम्मान दिलाने का अर्थ यह नहीं कि उसे उसकी प्रकृति के विरुद्ध धकेल दिया जाए।

जन-भाषा का स्वभाव: लचीलापन और अव्यवस्था

जन-भाषा का सबसे बड़ा गुण है—लचीलापन।

जन-भाषाएँ सरल होती हैं, उनमें नियम टूटते हैं, अपवाद बढ़ते हैं, शब्द बिगड़ते-बनते हैं, और लोग अपनी सुविधा से नए शब्द गढ़ लेते हैं। यही कारण है कि जन-भाषाएँ जीवित रहती हैं। वे शुद्धता नहीं, संचार को प्राथमिकता देती हैं।

हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी—सब इसी रास्ते से गुज़री हैं। जन-भाषा का सौंदर्य ही यही है कि वह अनुशासन नहीं, सहजता चाहती है।

संस्कृत का स्वभाव: अनुशासन और सटीकता

संस्कृत का स्वभाव इसके ठीक उलट है।

संस्कृत एक औपचारिक, नियमबद्ध और अत्यंत अनुशासित भाषा है। उसका व्याकरण लचीला नहीं, बल्कि सख़्त है। शब्द मनमानी से नहीं बनते, बल्कि धातु, उपसर्ग, प्रत्यय और नियमों के कठोर ढाँचे में ढलकर आते हैं।

यही अनुशासन संस्कृत को ज्ञान, सिद्धांत और दर्शन की भाषा बनाता है। लेकिन यही अनुशासन उसे जन-भाषा बनने से रोकता भी है।

जन-भाषा बनने का खतरा: विकृति का जोखिम

यदि संस्कृत को ज़बरदस्ती जन-भाषा बनाने की कोशिश की गई, तो दो ही परिणाम होंगे—

या तो लोग संस्कृत नहीं अपनाएँगे,

या फिर संस्कृत को इतना सरल और ढीला कर दिया जाएगा कि वह अपना वैज्ञानिक और व्यवस्थित स्वरूप खो देगी।

ऐसी “सरल संस्कृत” न जन-भाषा बन पाएगी, न ज्ञान-भाषा रह पाएगी। यह सबसे बड़ा नुकसान होगा।

ऐतिहासिक सत्य: संस्कृत कभी जन-भाषा नहीं रही 

(कुछ मान्यताओं के अनुसार, हालांकि यह पूरी तरह से प्रामाणिक नहीं है)

संस्कृत हमेशा सीखी हुई भाषा रही, स्वाभाविक बोली नहीं। वह गुरुकुल, आश्रम, विद्या-पीठ और राजदरबार की भाषा थी—जनसाधारण की आपसी बातचीत की नहीं। (यहाँ पूरी तरह से हमारी सहमती नहीं है क्योंकि इसके विरुद्ध भी कई प्रमाण उपलब्ध हैं, फिर भी यह एक पक्ष है अतः इसके साथ अपनी बात रख रहे हैं)

यदि संस्कृत सचमुच जन-भाषा होती, तो प्राकृत, पाली और अपभ्रंश जैसी भाषाओं के जन्म की आवश्यकता ही क्यों पड़ती?

प्राकृत और पाली: जन-भाषा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया

प्राकृत और पाली भाषाएँ किसी षड्यंत्र से नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता से पैदा हुईं।

जन-सामान्य को सरल, सहज और लचीली भाषाएँ चाहिए थीं—और वही उन्हें मिलीं।

यह विभाजन स्वाभाविक था—

संस्कृत ज्ञान के लिए,

प्राकृत-पाली जन-संवाद के लिए।

कालिदास का नाट्य-सत्य

कालिदास के नाटक इस भाषायी यथार्थ का सबसे सुंदर प्रमाण हैं।

उनके नाटकों में—

  1. राजा, ब्राह्मण और विद्वान संस्कृत बोलते हैं,
  2. जबकि दासियाँ, सैनिक, व्यापारी और सामान्य जन प्राकृत या पाली।
  3. यह कोई साहित्यिक सजावट नहीं, बल्कि समकालीन समाज का प्रतिबिंब है। संस्कृत की गरिमा को कालिदास ने सुरक्षित रखा—उसे जन-भाषा बनाकर सस्ता नहीं किया।

सम्मान का सही मार्ग: ज्ञान-भाषा के रूप में प्रतिष्ठा

यदि संस्कृत को सचमुच सम्मान दिलाना है, तो उसे—

  • ज्ञान की भाषा बनाया जाए
  • सिद्धांतों की भाषा बनाया जाए
  • दर्शन, तर्क और वैज्ञानिक सोच की भाषा बनाया जाए

उसे बाज़ार की भाषा बनाने से संस्कृत का नहीं, बल्कि हमारा आत्मसंतोष बढ़ेगा—संस्कृत का कद नहीं।

भावनात्मक राष्ट्रवाद बनाम बौद्धिक राष्ट्रधर्म

संस्कृत का भविष्य भावनात्मक नारों में नहीं, बौद्धिक जिम्मेदारी में है।

राष्ट्रधर्म यह नहीं कि हर चीज़ को लोकप्रिय बनाया जाए, बल्कि यह है कि हर चीज़ को उसके योग्य स्थान पर रखा जाए।

संस्कृत का स्थान भीड़ में नहीं, विचार के शिखर पर है।

निष्कर्ष: जो भाषा सोच की ऊँचाई पर खड़ी हो। संस्कृत को जन-भाषा बनाने की होड़ दरअसल उसकी महानता को न समझ पाने का परिणाम है। संस्कृत इसलिए महान नहीं कि उसे हर कोई बोले, बल्कि इसलिए महान है कि जो उसे बोले, वह सोच में ऊँचा उठे।

अंतिम वाक्य—संस्कृत को बचाने का रास्ता उसे जन-जन की भाषा बनाना नहीं, बल्कि ज्ञान-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!