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‘कालसर्प योग’ 

भारतीय ज्योतिष में ‘कालसर्प योग’ एक अत्यंत चर्चित, किंतु विवादास्पद विषय है। आधुनिक समय में यह योग जनमानस में भय और जिज्ञासा का विषय बन गया है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या कालसर्प योग की अवधारणा प्राचीन शास्त्रीय ज्योतिष में मिलती है, या यह एक आधुनिक मनगणंत रचना है।

प्रमुख ज्योतिष ग्रंथ जैसे-बृहत्पाराशर होराशास्त्र, बृहज्जातक, सारावली, फलदीपिका, जातक पारिजात—इनमें से किसी में भी ‘कालसर्प योग’ शब्द या इसकी स्पष्ट अवधारणा नहीं मिलती। यद्यपि ‘सर्पदोष’, ‘पितृदोष’ अथवा ‘शापदोष’ जैसे शब्द अवश्य मिलते हैं, किन्तु वे कालसर्प योग के समरूप नहीं माने जा सकते।

डॉ. वेंकट रमण ने अपनी प्रसिद्ध कृति Three Hundred Important Combinations’ में ज्योतिष के तीन सौ महत्त्वपूर्ण योगों का विवेचन किया है, किंतु इनमें उन्होंने ‘कालसर्प योग’ को कहीं भी स्थान नहीं दिया। यह तथ्य अपने-आप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि डॉ. वेंकट रमण कोई सामान्य लेखक नहीं थे—वे लगभग साठ वर्षों तक प्रतिष्ठित पत्रिका Astrological Magazine के संपादक रहे और आधुनिक काल के सबसे गंभीर, शास्त्रनिष्ठ तथा संतुलित ज्योतिषाचार्यों में गिने जाते हैं। कालसर्प योग के संदर्भ में उन्होंने एक पृथक टिप्पणी अवश्य की, जिसमें वे स्पष्ट रूप से कहते हैं —

“Kalasarpa Yoga (KSY) is said to be formed if All the planets are situated between Rahu and Kethu. The results are that countries and rulers are destroyed and people become afflicted. Strictly speaking, KSY does not find a place in the classical astrological literature. How this yoga gained currency and gathered a sinister meaning is not clear.” (यदि सभी ग्रह राहु और केतु के बीच स्थित हों, तो कहा जाता है कि कालसर्प योग बनता है। इसके फलस्वरूप देशों और शासकों का विनाश होता है तथा जनता कष्ट भोगती है। परंतु यदि सख्ती से कहा जाए तो कालसर्प योग का उल्लेख किसी भी प्राचीन ज्योतिषीय ग्रंथ में नहीं मिलता। यह योग कैसे प्रचलन में आया और इसके साथ इतना भयावह अर्थ कैसे जुड़ गया, यह स्पष्ट नहीं है।)

B.V. Raman / Three Hundred Important Combinations

(10th ed., delhi, 1991)

डॉ. वेंकट रमण का यह निष्कर्ष कालसर्प योग की शास्त्रीय प्रामाणिकता पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है और यह संकेत देता है कि इसका आधुनिक भयात्मक स्वरूप परंपरागत ज्योतिष की देन नहीं, बल्कि बाद की कल्पनात्मक व्याख्याओं का परिणाम है।

अनियंत्रित प्रचार—

डॉ० भोजराज द्विवेदी—जिन्होंने  ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ कालसर्प योग’ तथा ‘कालसर्पयोग और घट-विवाह पर शोधकार्य’ जैसी पुस्तकें लिखीं—ने कालसर्प योग की प्रामाणिकता और प्राचीनता सिद्ध करने के लिए ठोस शास्त्रीय प्रमाणों के स्थान पर कमजोर और अनुमानात्मक तर्कों का सहारा लिया। उन्होंने कालसर्प योग को तथाकथित रूप से ‘सर्पयोग’ का परिष्कृत रूप घोषित किया और इसे प्राचीन सिद्ध करने के लिए दीर्घ पौराणिक कथाओं और प्रतीकात्मक आख्यानों का सहारा लिया। 

समय के साथ कालसर्प योग में राहु की 12 भावों में स्थिति के आधार पर इसके बारह भेद गढ़े गए, जिन्हें क्रमशः अनन्त, कुलिक, वासुकी, शंखपाल, पद्म, महापद्म, तक्षक, कर्कोटक, शंखचूड़, घातक, विषधर तथा शेषनाग जैसे नाम दिए गए। इन नामों का प्रामाणिक शास्त्रीय स्रोत क्या है, यह तो भगवान ही जाने; किंतु आश्चर्य की बात यह है कि डॉ० द्विवेदी ने आगे चलकर विविध ग्रह-स्थितियों के आधार पर इन भेदों की संख्या बढ़ाकर पूरे 62208 प्रकार तक पहुँचा दी। 

एक-सी ग्रह-संरचना, भिन्न फल : कालसर्प योग की शास्त्रीय परीक्षा—

कालसर्प योग की प्रचलित परिभाषा के अनुसार यह तब माना जाता है जब जन्मकुंडली में सूर्य से शनि तक सभी सात ग्रह राहु और केतु के मध्य एक ही अक्ष में स्थित हों, अर्थात् राहु–केतु शेष ग्रहों को दोनों ओर से घेर लें और कुंडली के लगभग छह भाव रिक्त रह जाएँ। इस योग के फल संघर्ष, विलंब और अवरोध के रूप में वर्णित किए जाते हैं। 

यह  परिभाषा ‘नौका, कूट, छत्र और चाप’—इन चारों ‘नाभस’ योगों तथा ‘मालिका’ योग से मेल खाती है—

नौकूटच्छत्रचापानि तद्वत्सप्तर्क्षसंस्थितै: ।।

अर्द्धचन्द्रस्तु नावाद्यै: प्रोक्त:त्वन्यर्क्षसंस्थितै: ।। 

बृहज्जातकम्  १२.८ (नाभसयोगाध्याय:)

“यदि क्रमशः सात राशियों में लगातार स्थित हों,  तो ग्रहों की आकृति के अनुसार निम्न नाभस योग बनते हैं— नौ (नाव), कूट, छत्र, चाप।”

सारावली में भी इसी प्रकार परिभाषा है—

होरादिकण्टकेभ्यः सप्तर्क्षगतैः क्रमेण योगाः स्युः।

नौकूटच्छत्रकार्मुकनिर्दिष्टाः पूर्वयवनेन्द्रै:।।

सारावली 21-11 

  नौका आदि  योगों का आधार सूर्य से शनि तक सातों ग्रहों की लगातार सात भावों में क्रमिक स्थिति है। इन योगों में ग्रह कुंडली के एक सीमित खंड में संकेंद्रित होते हैं और शेष भाव रिक्त रह जाते हैं। इनका उल्लेख बृहत्पाराशर होराशास्त्र फलदीपिका आदि प्राचीन वैदिक ग्रंथों में स्पष्ट परिभाषा और फल-सूत्रों सहित मिलता है। इन योगों के फल अनिवार्य रूप से अशुभ नहीं, बल्कि ग्रहों की शुभ–अशुभ प्रकृति और बल पर निर्भर माने गए हैं।

‘मालिका’ योग भी इसी वर्ग का योग है, जिसमें राहु–केतु को छोड़कर सातों ग्रह लगातार सात भावों में स्थित होकर ग्रहों की एक माला बनाते हैं। इसका फल उस भाव से निर्धारित होता है जहाँ से यह क्रम प्रारम्भ होता है। शास्त्रों में इसके परिणाम प्रायः शुभ बताए गए हैं और इसे क्रमिक ग्रह-संरचना पर आधारित मान्य योग स्वीकार किया गया है।

संरचनात्मक दृष्टि से देखें तो इन सभी योगों में एक स्पष्ट समानता है—
ग्रहों का कुंडली के एक सीमित भाग में संकेंद्रण।

कालसर्प योग में भी सभी ग्रह राहु–केतु के एक ओर सीमित हो जाते हैं और कुंडली के छह भाव रिक्त रह जाते हैं।

यदि माला, नौका, कूट, छत्र, चाप आदि शास्त्रीय योगों में ग्रहों की कालसर्प योग जैसी संरचना हो, अर्थात् सूर्य से शनि तक सभी ग्रह राहु–केतु के बीच एक ही खंड में स्थित हों, तो आधुनिक दृष्टि के अनुसार वहाँ तथाकथित कालसर्प योग मान लिया जाएगा और उसका फल स्वभावतः अशुभ घोषित कर दिया जाएगा। किंतु यह मान्यता एक गंभीर शास्त्रीय विरोधाभास उत्पन्न करेगी, क्योंकि माला आदि योगों के विषय में प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों में शुभ और फलदायक परिणाम स्पष्ट रूप से वर्णित हैं। यदि ग्रहों का एक खंड में संकेंद्रित होना ही दोष का आधार होता, तो नौ–कूट–छत्र–चाप और मालिका जैसे शास्त्रीय योग भी अशुभ माने जाते।

उपरोक्त विवेचन से यह निष्कर्ष स्पष्ट रूप से निकलता है कि ‘कालसर्प योग’ न तो प्राचीन शास्त्रीय ज्योतिष की मान्य अवधारणा है और न ही इसके लिए कोई ठोस, सर्वमान्य ग्रंथ-साक्ष्य उपलब्ध है। कालसर्प योग का भयात्मक स्वरूप शास्त्रसम्मत निष्कर्ष नहीं, बल्कि आधुनिक काल में विकसित हुआ एक मनोवैज्ञानिक और व्यावसायिक आख्यान है। अतः ज्योतिषीय विवेचन में किसी भी योग का मूल्यांकन करते समय भावुकता या जनश्रुति के स्थान पर प्रामाणिक ग्रंथों, ग्रहों के बल, स्वभाव और संपूर्ण कुंडली-संदर्भ को ही आधार बनाना चाहिए। यही दृष्टि न केवल शास्त्रसम्मत है, बल्कि ज्योतिष को भय के नहीं, विवेक और तर्क के मार्ग पर स्थापित करती है।

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