यह पुस्तक भारतीय ज्योतिष के गहन विश्लेषण और पुनर्स्थापन के उद्देश्य से लिखी गई है। यह पुस्तक न केवल ज्योतिष की वर्तमान विकृतियों पर प्रकाश डालती है, बल्कि इसके ऐतिहासिक, वैज्ञानिक और दार्शनिक पहलुओं को भी तर्कसंगत ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।
यह पुस्तक चार प्रमुख भागों में व्यवस्थित की गई है, जिनके माध्यम से फलित ज्योतिष के विभिन्न पहलुओं का क्रमबद्ध और समग्र विश्लेषण किया गया है।
प्रथम भाग में आज के समाज में ज्योतिष के प्रति सोच, ज्योतिष की व्युत्पत्ति, मूल अवधारणाओं तथा वर्तमान युग में इसकी प्रासंगिकता और असफलताओं पर विमर्श किया गया है। इस खंड का उद्देश्य है—ज्योतिष के ऐतिहासिक एवं सैद्धांतिक स्वरूप को स्पष्ट करना।
द्वितीय भाग में ज्योतिष के विवादास्पद पक्षों को विश्लेषण की दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है। इसमें उन सभी प्रमुख तर्कों और आपत्तियों का संकलन किया गया है जो प्रायः ज्योतिष के विरोध में प्रस्तुत किए जाते हैं, तथा उनका तर्कसंगत और सुसंगत उत्तर देने का प्रयास किया गया है।
तृतीय भाग ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष को केंद्र में रखता है। इसमें इस प्राचीन विद्या की वैज्ञानिक संभावनाओं, उसकी कार्यपद्धति तथा आधुनिक विज्ञान से उसके संभावित संवाद की विवेचना की गई है।
चतुर्थ भाग में आज के समय में ज्योतिष की व्यावहारिक समस्याओं, उनकी समाधान की संभावनाओं तथा इस विद्या के संरक्षण और संवर्धन हेतु आवश्यक सुझावों को समाहित किया गया है।
इस ग्रंथ का उद्देश्य न तो किसी मत को थोपना है, न ही किसी विमर्श को अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत करना। यह केवल एक विनम्र प्रयास है—ज्योतिष के उस स्वरूप को सामने लाने का, जो तर्क, विज्ञान, अनुभव और परंपरा के समन्वय से जन्म लेता है।
पाठकों से यही अपेक्षा है कि वे इस पुस्तक को खुली दृष्टि से पढ़ें—आस्थावान होकर नहीं, आलोचक होकर भी नहीं, बल्कि एक शोधकर्ता की निष्पक्ष दृष्टि से। यदि यह प्रयास कहीं भी किसी पाठक को सोचने, प्रश्न करने या समझने की एक नई दिशा देता है, तो यह लेखन सफल माना जाएगा।
यह पुस्तक पाठकों को ज्योतिष को केवल एक धार्मिक विषय के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित प्राचीन विज्ञान के रूप में देखने के लिए प्रेरित करती है। यह पुस्तक उन सभी के लिए अनिवार्य है जो ज्योतिष के नाम पर फैले भ्रम को दूर करके उसके प्रामाणिक स्वरूप को जानना चाहते हैं।
मूल्य 200
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