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हस्तरेखा शास्त्र

हस्त रेखा के प्रचलित सिद्धांत

हस्तरेखा के जो सिद्धांत आजकल प्रचलित है वह न तो हस्तरेखा के मूल सिद्धांत है और न ही भारतीय सामुद्रिक शास्त्र से संबंध रखते हैं ।

आइए तथ्यों और प्रमाणों के साथ आरंभ करते हैं ।

आधुनिक हस्त रेखाओं के सिद्धांतों का प्रतिपादन करने वाले आयरलैंड में जन्मे कीरो (CHEIRO) थे , जिनका मूल नाम ‘विलियम जॉन वार्नर’ था। जन-श्रुतियाँ प्रचलित है कि उन्होंने कई प्रसिद्ध हस्तियों के हाथ देखे व सटीक भविष्यवाणियाँ की। इन दावों की प्रामाणिकता ऐतिहासिक व वैज्ञानिक रूप से संदिग्ध है। वैसे तो विदेशों में हस्तरेखा के सिद्धांत कीरो से सदियों पुराने हैं परंतु भारत में कीरो ने ही प्रसिद्धि पायी।

कीरो ने हस्तरेखा पर कई किताबें लिखी। उनकी पहली किताब “Cheiro’s Language of the Hand” है जो उन्होने स्वयं ही 1894 में प्रकाशित की। इस किताब में इन्होंने लिखा है कि मुझे यह ज्ञान भारत से ही मिला है। इन दावों की पुष्टि हम नहीं करते। अगर यह ज्ञान उन्हें भारत से मिलता तो उनके सिद्धांतों तथा भारतीय सामुद्रिक सिद्धांतों में इतना अंतर न होता। ख़ैर, कीरो को ही पढ़कर आज के ज्योतिषी हस्तरेखा विशेषज्ञ बन रहे हैं । कीरो के सिद्धांत कहाँ तक सटीक हैं यह तो वे (तथाकथित) विशेषज्ञ ही जानें परंतु सत्य व प्रामाणिक बात यह है कि कीरो के हस्तरेखा के सिद्धांतों और भारतीय हस्तरेखा के सिद्धांतों में जमीन-आसमान का अंतर है ।

हस्तरेखा के ज्ञान को भारत में सामुद्रिक शास्त्र के अंतर्गत रखा गया है। भारत के सामुद्रिक शास्त्र में संपूर्ण शरीर का महत्त्व है न कि केवल हाथ का। सामुद्रिक शास्त्र में मनुष्य के नख से शिख तक का वर्णन है।

सामुद्रिक शास्त्र बृहत् संहिता, अग्नि पुराण, गरुड़ पुराण, भविष्य पुराण तथा अनेकानेक स्वतंत्र ग्रंथों में बिखरा पड़ा है।

पश्चिमी देशों में हाथ की रेखाओं का विश्लेषण ‘पामिस्ट्री’ (Palmistry) के नाम से स्थापित हुआ है। जिसका शाब्दिक अर्थ होता है—हस्त विद्या। पामिस्ट्री में केवल हाथ की हथेली में स्थित रेखाओं, आकार और चिन्हों का अध्ययन कर व्यक्ति के स्वभाव, भविष्य और जीवन की घटनाओं का अनुमान लगाया जाता है। इस विषय पर वहाँ अनेक ग्रंथ और पुस्तकें लिखी गई हैं, और यह अध्ययन पद्धति वहाँ काफी लोकप्रिय रही है।

इसके विपरीत, भारतीय परंपरा में केवल हाथ की रेखाओं तक सीमित न रहकर, पूरे शरीर के अंगों—जैसे मस्तक, नेत्र, नख, जिह्वा, त्वचा और यहाँ तक कि चाल और स्वर तक—का विश्लेषण किया गया है। भारत में इसे अधिक व्यापक रूप से सामुद्रिक शास्त्र के अंतर्गत देखा जाता है।

जहाँ तक केवल हस्तरेखा विज्ञान की बात है, भारत में इस विषय पर बहुत अधिक ग्रंथ नहीं बचे हैं। वर्तमान में केवल दो या तीन प्रामाणिक ग्रंथ ही उपलब्ध माने जाते हैं। उनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है— ‘हस्तसंजीवनम्’। यह ग्रंथ लगभग 17वीं शताब्दी का माना जाता है, जिसकी रचना जैन परंपरा के मेघविजय गणी ने की थी। इस ग्रंथ में उन्होंने भारतीय हस्तरेखा शास्त्र की गूढ़ परंपराओं का पूर्ण अनुसरण करते हुए, अत्यंत विस्तृत और सुव्यवस्थित रूप में सिद्धांतों को प्रस्तुत किया है।

इस प्रकार, जहाँ पाश्चात्य हस्तरेखा विद्या केवल हाथ की रेखाओं तक सीमित है, वहीं भारतीय परंपरा में यह अध्ययन एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ पूरे शरीर के लक्षणों की समग्र विवेचना पर आधारित है।

और, अब हम भारतीय व पाश्चात्य हस्तरेखा के सिद्धांतों की तुलना करते है—

आधुनिक ज्योतिषियों द्वारा लिखित हस्तरेखा पर कोई भी किताब उठाकर देख लीजिए उसमें हाथ पर ग्रहों से संबंधित पर्वतों का स्थान निम्न तरीके से निश्चित है जैसा चित्र में दिखाया गया है।

hastrekha palmistry

अंगूठे के पास शुक्र का पर्वत, तर्जनी के पास बृहस्पति का पर्वत, मध्यमा के पास शनि का पर्वत, अनामिका के पास सूर्य का पर्वत, कनिष्ठा के पास बुध का पर्वत तथा कनिष्ठा से नीचे मंगल का पर्वत निश्चित किया गया है । और तो और, आज के ज्योतिषी रत्न पहनाते समय अंगुली का निर्धारण भी इन्हीं पर्वतों में निर्धारित ग्रहों के अनुसार निश्चित करते हैं।

अब देखते हैं कि भारतीय हस्तरेखा शास्त्र के अनुसार हाथों में ग्रहों के स्थान किस प्रकार निर्धारित किए गए हैं?

“हस्त संजीवनम्” के पाँचवें अध्याय के नौवें श्लोक में इससे संबंधित श्लोक निम्न प्रकार है—

रविरंगुष्ठमध्यस्थः तन्नखं चंद्रमा स्फुटः।

मंगलस्तर्जनीशीर्षे नृपासनगतो बुधः।।

लक्ष्म्यां गुरुः कविर्गौर्यां कनिष्ठायां शनिः स्मृतः।

हस्तपृष्ठे राहुकेतू चैवं वारास्तथा ग्रहाः।।

हस्त संजीवनम् 5-9

अर्थात् अंगूठे के मध्य पर्व में सूर्य, अंगूठे के ही अंत्य पर्व में चंद्र, तर्जनी के शीर्ष (अंत्य पर्व) में मंगल, अंगूठे के आदि पर्व में बुध स्थित है। मध्यमा के अंत्य पर्व में गुरु, अनामिका के तृतीय पर्व में शुक्र, कनिष्ठा के तृतीय पर्व में शनि और हस्त पृष्ठ (हाथ के पीछे वाले भाग) में राहु व केतु व्यवस्थित है ।

इसका मतलब यह है कि ग्रहों की अवस्थिति अंगुलियों के पोरों पर है न कि हथेली पर, तथा भारतीय हस्त सामुद्रिक में इसी अवस्थिति के आधार पर फलादेश भी किया जाता है। स्वाभाविक है कि फलादेश में भी बहुत अधिक अंतर होगा।

अब आते हैं हाथ की रेखाओं पर। हाथ की रेखाओं का नामकरण कीरो के अनुसार (जिसका आधुनिक ज्योतिषी अनुसरण करते हैं)—अंगूठे को घेरकर तर्जनी से मणिबंध की तरफ जाती रेखा को जीवन रेखा नाम दिया गया है, ऊपर की अंगुलियों में पहली तिरछी रेखा को हृदय रेखा तथा उसके नीचे जीवन रेखा के पास तिरछी रेखा को मस्तिष्क रेखा का नाम दिया गया है। इन्हीं नामों के अनुसार संबंधित फलादेश किया जाता है ।

भारतीय हस्तरेखा सिद्धांत के अनुसार इन रेखाओं के नाम इस प्रकार हैं-

“स्कंद पुराण” में संबंधित श्लोक इस प्रकार है—

आपाणिमूलकरभान्निसृत्यांगुष्ठतर्जनी मध्ये ।

नूनं भवन्ति तिस्रो गोत्रद्रव्यायुषो रेखा ।।

अर्थात् हथेली के मूल यानी मणिबंध से अंगूठे को जाने वाली क्रम से तीन रेखाएं है—गोत्र रेखा, द्रव्य रेखा और आयु रेखा ।

हस्त संजीवन में श्लोक इस प्रकार है—

रत्नाकराद् गोत्र रेखा करभाद्धनतेजसोः ।

एता रेखा यान्ति तिस्रस्तर्जन्यंगुष्ठकान्तरे ।।

रेखास्तिस्रोऽप्यमी येषां सम्पूर्णा दोषवर्जिताः ।

गोत्रे धने जीविते च …………।।

अर्थात् तर्जनी से अंगूठे को घेरती हुई गोत्र रेखा या पितृ रेखा, उसके बाद द्रव्य रेखा(मातृ रेखा) तथा उसके बाद आयु रेखा होती है ।

आधुनिक ज्योतिषी जिसे जीवन रेखा (life line) कहते हैं उसे भारतीय हस्तरेखा शास्त्र में उसे पितृ रेखा कहा जाता है, जिसे वे मस्तिष्क रेखा(head line) कहते हैं उसे भारतीय ज्योतिष में मातृ रेखा या धन रेखा कहा जाता है तथा जिसे वे हृदय रेखा (heart line) कहते हैं उसे भारतीय ज्योतिष में आयु रेखा या जीवित रेखा कहा जाता है और उसी के अनुसार फलादेश भी किया जाता है।

अब आप देख सकते हैं कि रेखाओं के नाम के अनुसार ही हस्तरेखा शास्त्र में फलादेश करने का नियम है परंतु जब नामों में ही इतना अंतर है तो फलादेश में कितनी भिन्नताएँ होगी। अब कौन सा फलादेश सटीक है यह अनुभवी लोग अच्छी तरह जान सकते हैं ।

भारतीय सामुद्रिक शास्त्र में मणिबंध तथा अंगूठे के पोर पर बने हुए यव को बहुत महत्त्व दिया जाता है, जबकि पाश्चात्य हस्तरेखा विज्ञान (Palmistry) में इनका कोई वर्णन नहीं है। भारतीय सामुद्रिक शास्त्र में हाथों की उंगलियों के तीनों पर्वों में बनने वाली रेखाओं का भी विश्लेषण है, जो कि पाश्चात्य हस्तरेखा में नहीं है।

भारतीय हस्तरेखा शास्त्र में हथेली पर राशियों, नक्षत्रों तथा तिथियों के स्थान भी निर्धारित हैं, पाश्चात्य ज्योतिष में ऐसा कुछ नहीं है । अब आप सोचिए कि इन भिन्नताओं से फलादेश में कितनी भिन्नताएँ आतीं होंगी?

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