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“क्या गुरुत्वाकर्षण की खोज भास्कराचार्य ने की?”

“क्या गुरुत्वाकर्षण की खोज न्यूटन से पहले भास्कराचार्य ने कर ली थी?”

bhaskaracharya

यह प्रश्न भावनात्मक गौरव या सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा का नहीं, बल्कि इतिहास, विज्ञान और ज्ञान-पद्धति का है। यदि इसे पूर्वाग्रह, अतिरंजना या आत्मरक्षा की भावना से देखा जाएगा, तो न तो भास्कराचार्य के वास्तविक योगदान के साथ न्याय होगा और न ही न्यूटन के वैज्ञानिक महत्त्व को ठीक से समझा जा सकेगा। अतः इस विषय पर चर्चा करते समय यह आवश्यक है कि हम “किसने पहले कहा” के स्थान पर यह पूछें कि किस अर्थ में कहा, किस स्तर पर कहा, और वह कथन विज्ञान के किस मानदंड पर खरा उतरता है। इसी निष्पक्ष और बौद्धिक कसौटी पर रखकर यदि भास्कराचार्य और न्यूटन दोनों के विचारों का विश्लेषण किया जाए, तभी इस विवाद का संतुलित और प्रामाणिक समाधान संभव है।

न्यूटन ने सन् 1687 ई० में प्रकाशित Principia Mathematica में सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण का नियम प्रतिपादित किया। उनके अनुसार ब्रह्मांड के किसी भी दो पिंडों के बीच आकर्षण बल उनके द्रव्यमानों के गुणनफल के समानुपाती तथा उनके केंद्रों के बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है।

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण नियम - ऑनर्स लैब भौतिकी - सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण

इसके विपरीत, 12वीं शताब्दी के महान भारतीय गणितज्ञ-ज्योतिषी भास्कराचार्य ने सिद्धांत शिरोमणि के गोलाध्याय में गुरुत्वाकर्षण की चर्चा अवधारणात्मक और प्रेक्षणात्मक रूप में की—

आकृष्टिशक्तिश्च महि तया यत्। खस्थं गुरु स्वभिमुखं स्वशक्त्या ॥

आकृष्यते तत्पततीव भाति। समेसमन्तात् क्व पतत्वियं खे ॥ 

(सिद्धान्त शिरोमणि, गोलाध्याय—भुवनकोष-६)

अर्थात

“पृथ्वी में एक आकर्षण-शक्ति है। उसी शक्ति के कारण आकाश में स्थित कोई भी भारी वस्तु अपनी ही शक्ति से पृथ्वी की ओर आकृष्ट होती है और गिरती हुई प्रतीत होती है। यदि चारों ओर समान रूप से आकर्षण होता, तो फिर आकाश में गिरने की दिशा (नीचे की ओर ही गिरना) कैसे निश्चित होती?” 

भास्कराचार्य का कथन यह दर्शाता है कि वे आकर्षण-शक्ति (माध्यकर्षण) की धारणा से पूर्णतः परिचित थे, किंतु उन्होंने उसे किसी सार्वभौमिक गणितीय सूत्र में नहीं बाँधा।

अतः वास्तविक अंतर यह नहीं है कि भास्कराचार्य को गुरुत्वाकर्षण ज्ञात था या नहीं—उन्हें यह स्पष्ट रूप से ज्ञात था। अंतर यह है कि—

  1. न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण को सार्वभौमिक भौतिक नियम के रूप में गणितीय ढाँचे में प्रस्तुत किया, जबकि 
  2. भास्कराचार्य ने उसे प्राकृतिक तथ्य और खगोलीय यथार्थ के रूप में गुणात्मक भाषा में व्यक्त किया।

इस प्रकार भास्कराचार्य का योगदान वैचारिक और दार्शनिक बोध का है, और न्यूटन का योगदान सूत्रबद्ध वैज्ञानिक नियम का। दोनों को एक-दूसरे का विरोधी नहीं, बल्कि भिन्न ज्ञान-परंपराओं के प्रतिनिधि के रूप में समझना अधिक न्यायसंगत है।

यदि हम आधुनिक विज्ञान को कसौटी बनाएँ—तो न्यूटन निःसंदेह कहीं आगे खड़े हैं।

न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण केवल एक “विचार” नहीं था, बल्कि एक सटीक, सार्वत्रिक, गणितीय नियम था, जो

  1. ग्रहों की गति की भविष्यवाणी कर सकता था, 
  2. उपग्रहों की कक्षा निर्धारित कर सकता था, 
  3. ज्वार-भाटा समझा सकता था, और 
  4. बाद में पूरी शास्त्रीय भौतिकी की रीढ़ बना

यह गुणात्मक वर्णन नहीं, बल्कि परिमाणात्मक सिद्धांत था—जिसे प्रयोग, गणना और पुनरावृत्ति से जाँचा जा सकता था। इसी कारण न्यूटन का सिद्धांत आज भी इंजीनियरिंग, खगोलभौतिकी और अंतरिक्ष विज्ञान में कार्यरत है (सुधारों के बावजूद)।

इसके विपरीत, भास्कराचार्य ने जो कहा, वह पृथ्वी द्वारा वस्तुओं को आकर्षित करने की सही पहचान तो है,

  1. पर वह न तो सार्वभौमिक रूप से परिभाषित है, 
  2. न उसमें गणितीय संरचना है, 
  3. न उससे कोई भविष्यवाणी-तंत्र विकसित होता है।

अर्थात् भास्कराचार्य का कथन वैज्ञानिक पूर्वाभास (insight) है, वैज्ञानिक सिद्धांत (theory) नहीं—और आधुनिक विज्ञान में यह अंतर निर्णायक होता है।

यह कहना भी बौद्धिक रूप से ईमानदार होगा कि—

  1. यदि न्यूटन न होते, तो आज का आधुनिक भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान और तकनीकी सभ्यता जिस रूप में है, वह संभव नहीं होती। जबकि, 
  2. यदि भास्कराचार्य न भी होते, तो गुरुत्वाकर्षण का गणितीय सिद्धांत अंततः किसी न किसी रूप में विकसित हो ही जाता—क्योंकि उस परंपरा ने उस दिशा में आगे बढ़ने की पद्धति नहीं बनाई।

 इसलिए महत्त्व की बात करें तो—

  1. भास्कराचार्य का महत्त्व इतिहास-बोध और वैचारिक प्रज्ञा में है, 
  2. न्यूटन का महत्त्व विज्ञान-निर्माण और सभ्यता-निर्माण में है—और यह महत्त्व वास्तव में अधिक है।

  1.  भारतीय परंपरा सच में कहाँ अग्रणी थी—

कहाँ आधुनिक विज्ञान (न्यूटन परंपरा) ने निर्णायक छलाँग लगाई? कहाँ तुलना करना ही अनुचित है?

भारतीय परंपरा सच में कहाँ अग्रणी थी? यहाँ “अग्रणी” शब्द भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक-तथ्यात्मक अर्थ में है।

  1. आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य—इन लोगों ने ग्रहों की आवर्तकाल गणना, चंद्रग्रहण–सूर्यग्रहण की भविष्यवाणी, साइन (ज्या), कोज्या जैसी त्रिकोणमितीय संकल्पनाएँ ऐसे समय में दीं, जब यूरोप में ये विषय लगभग अनुपस्थित थे। यह तथ्य है। 
  2. दशमलव स्थानमान पद्धति और शून्य, यह केवल गणितीय सुविधा नहीं थी; इसने उच्च गणित को संभव बनाया। इसके बिना न्यूटन का कैलकुलस भी संभव नहीं था—यह सीधा तथ्य है, कोई गौरव-वाक्य नहीं। 
  3. प्राकृतिक घटनाओं का गैर-धार्मिक विश्लेषण भारतीय ज्योतिष-खगोल ग्रंथों में ग्रहण, ऋतु,गति—इनकी व्याख्या, देव-कोप या मिथक के बजाय गणित और प्रेक्षण से की गई। यह मध्यकालीन यूरोप से स्पष्ट रूप से आगे था। यहाँ भारतीय परंपरा वास्तव में अग्रणी थी।

 आधुनिक विज्ञान ने कहाँ निर्णायक छलाँग लगाई? अब यहाँ कोई संतुलन नहीं, सीधी बात—

  1. प्रकृति के सार्वभौमिक नियम—न्यूटन से पहले दुनिया में कोई भी सभ्यता—भारतीय, चीनी, इस्लामी—ऐसा नियम नहीं दे पाई जो पृथ्वी और आकाश दोनों पर समान रूप से लागू हो और गणितीय रूप से परीक्षणीय हो, यह छलाँग अभूतपूर्व थी। 
  2. प्रयोग + गणित + पूर्वानुमान— भारतीय परंपरा में प्रेक्षण था, गणना थी, पर नियंत्रित प्रयोग और falsifiability नहीं थी। न्यूटन परंपरा ने पहली बार कहा: यदि गणना गलत निकले, तो सिद्धांत गलत है। यह मानसिकता सभ्यता-निर्माण करती है।
  3. प्रौद्योगिकी का जन्म— न्यूटन → लैप्लास → मैक्सवेल → आइंस्टीन → रॉकेट, सैटेलाइट, GPS—यह सीधी शृंखला है।

 भारतीय ज्ञान परंपरा वहाँ रुक गई, आगे institutional science नहीं बनी।

यहाँ आधुनिक विज्ञान निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ है। 

जहाँ तुलना करना ही अनुचित है—यह सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है। भारतीय परंपरा का लक्ष्य था: ऋत का बोध, जगत का अर्थ, मनुष्य का स्थान। आधुनिक विज्ञान का लक्ष्य है: नियम, नियंत्रण, उपयोग, शक्ति।

इसलिए यह कहना कि “भारतीय परंपरा न्यूटन नहीं दे पाई” उतना ही अधूरा है जितना यह कहना कि

“न्यूटन वेदांत नहीं दे पाया।” वे अलग प्रश्नों के उत्तर हैं।

निष्कर्ष (बिलकुल स्पष्ट)—

  1. हाँ, न्यूटन का वैज्ञानिक महत्व अधिक है — इसमें कोई संदेह नहीं। 
  2. हाँ, भारतीय परंपरा आधुनिक विज्ञान का विकल्प नहीं है।

 लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि आधुनिक विज्ञान जिन गणितीय औजारों पर खड़ा है, उनमें से अधिकतर भारत से आए।

गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा भारत में बहुत प्राचीन काल से प्रचलित है। वैशेषिक दर्शन में गुरुत्वाकर्षण (गुरुत्व) की अवधारणा का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है, जिसका प्रतिपादन महर्षि कणाद (लगभग 600 ईसा पूर्व) द्वारा रचित वैशेषिक सूत्र में किया गया है। कणाद के अनुसार जगत् की घटनाओं की व्याख्या द्रव्य, गुण और कर्म के माध्यम से होती है, और इसी संदर्भ में गुरुत्व को एक मौलिक प्राकृतिक गुण के रूप में स्वीकार किया गया है।

 वैशेषिक सूत्र 5.1.7 में मिलता है— संयोगभावे गुरुत्वात्पतनम्”।

जहाँ यह संकेत किया गया है कि पृथ्वी-तत्त्व से युक्त वस्तुएँ गुरुत्व के कारण अधोगति करती हैं, इससे यह स्पष्ट होता है कि कणाद गति के कारणों को केवल आकस्मिक न मानकर, द्रव्यगत गुणों से जोड़ते हैं।

प्रशस्तपाद द्वारा रचित प्रशस्तपाद भाष्य में गुरुत्व की अवधारणा को और अधिक स्पष्ट किया गया है। वहाँ गुरुत्व को द्रव्य के अंतर्निहित गुण के रूप में स्वीकार करते हुए, उसे वस्तु की प्रकृति और भार से संबद्ध किया गया है। यद्यपि यह आधुनिक भौतिकी की तरह गणितीय सूत्रों में व्यक्त नहीं है, फिर भी न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत से इसकी वैचारिक समानता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

अतः यह स्पष्ट है कि गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा भारतीय परंपरा में कणाद और भास्कराचार्य जैसे आचार्यों को ज्ञात थी, किंतु उसे सार्वभौमिक, गणितीय और परीक्षणीय वैज्ञानिक नियम का रूप न्यूटन ने दिया। इसलिए भास्कराचार्य को गुरुत्व का दार्शनिक–वैचारिक ज्ञाता और न्यूटन को उसका आधुनिक वैज्ञानिक प्रतिपादक मानना ही ऐतिहासिक व बौद्धिक रूप से सर्वाधिक न्यायसंगत निष्कर्ष है।

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