आज आयुर्वेद की सफलता पर प्रश्नचिह्न लगाए जाते हैं।
अक्सर कहा जाता है कि आयुर्वेद काम नहीं करता, कि वैद्य भरोसेमंद नहीं रहे, कि गंभीर रोगों में अंततः एलोपैथी की शरण लेनी ही पड़ती है। अनेक रोगी आयुर्वेदिक उपचार से निराश होकर आधुनिक चिकित्सा की ओर चले जाते हैं और फिर उसी अनुभव को आयुर्वेद की अक्षमता का प्रमाण बना दिया जाता है।
लेकिन यह प्रश्न कभी ईमानदारी से नहीं पूछा जाता कि यह असफलता आयुर्वेद की है या उस विकृत ढाँचे की, जिसमें आज आयुर्वेद को जिंदा रखा गया है। वास्तविक कारण किसी वैद्य की व्यक्तिगत कमी नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक, सुनियोजित और बौद्धिक षड्यंत्र है, जिसने आयुर्वेद की जड़ों को भीतर ही भीतर खोखला कर दिया है।
इसी षड्यंत्र का एक प्रमुख रूप यह है कि जिस आयुर्वेद की जड़ें संस्कृत भाषा में गहराई तक धँसी हुई हैं, उसे पढ़ने के लिए आज इंग्लिश मीडियम में बायोलॉजी पढ़े हुए छात्रों को ही योग्य मान लिया गया है, और संस्कृत पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को लगभग अयोग्य ठहरा दिया गया है। यह कोई साधारण शैक्षणिक भूल नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी चाल, सुनियोजित रणनीति और घोर बौद्धिक षड्यंत्र स्पष्ट दिखाई देता है।
बायोलॉजी और आयुर्वेद के बीच केवल विषय का नहीं, दृष्टि का अंतर है। बायोलॉजी की शब्दावली रासायनिक, यांत्रिक और विश्लेषणात्मक है, जबकि आयुर्वेद की शब्दावली दार्शनिक, प्रक्रियात्मक और समग्र है। ‘कोशिका’, ‘एंज़ाइम’ और ‘हार्मोन’ की भाषा में प्रशिक्षित मस्तिष्क जब ‘दोष’, ‘धातु’, ‘अग्नि’ और ‘ओजस्’ जैसे शब्दों के सामने बैठता है, तो वह उन्हें समझने का प्रयास नहीं करता, बल्कि उन्हें अपने परिचित ढाँचे में फिट करने की कोशिश करता है। यही वह क्षण है जहाँ आयुर्वेद का क्षरण शुरू होता है।
बायोलॉजी पढ़ा हुआ छात्र एक विशेष ऐतिहासिक कथा में पला होता है — कि मानव ज्ञान का विकास आदिम से आधुनिक की ओर हुआ है, कि प्राचीन ज्ञान अपूर्ण था और आधुनिक विज्ञान उसका परिष्कृत रूप है। इसी मानसिकता के साथ जब वह आयुर्वेद पढ़ता है, तो उसे एक जीवंत चिकित्सा-दर्शन नहीं, बल्कि एक पुरातन, अविकसित और पिछड़ा ज्ञान-तंत्र दिखाई देता है। वह आयुर्वेद को जानने नहीं, उसे “अपडेट” करने बैठता है। यह दृष्टि अध्ययन की नहीं, उपद्रव की है।
सबसे विडंबनापूर्ण तथ्य यह है कि ऐसे छात्र संस्कृत से पहली बार तब परिचित होते हैं, जब वे आयुर्वेद की डिग्री ले रहे होते हैं। जिस भाषा में चरक, सुश्रुत और वाग्भट ने अपने विचार गढ़े, उसी भाषा को छात्र जीवन में हाशिए पर रख दिया जाता है। इसके विपरीत, कोई भी एमबीबीएस छात्र यह अपेक्षा नहीं करता कि वह अंग्रेज़ी पहली बार मेडिकल कॉलेज में जाकर सीखे। अंग्रेज़ी उसकी पूर्व-योग्यता है, क्योंकि आधुनिक चिकित्सा की भाषा वही है। फिर आयुर्वेद के साथ यह दोहरा मापदंड क्यों? इसका सीधा अर्थ यही है कि संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा को मूलतः हीन समझ लिया गया है।
जब संस्कृत को अनावश्यक घोषित कर दिया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से आयुर्वेद का अध्ययन अनुवादों पर निर्भर हो जाता है। और ये अनुवाद अक्सर अधकचरे, सतही और भ्रामक होते हैं। ‘अग्नि’ को पाचन कह दिया जाता है, ‘दोष’ को रोग, ‘ओजस्’ को इम्युनिटी। इस तरह आयुर्वेद का पूरा दार्शनिक ढाँचा शब्दकोशीय समतुल्यताओं में घोंट दिया जाता है। ऐसे अनुवाद पढ़कर जो आयुर्वेदाचार्य बनता है, वह न ग्रंथ समझता है, न परंपरा — वह केवल शब्दों का भ्रम पालता है।
अनुवादों के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:— अग्नि—बायोलॉजी अनुवाद: Digestion / Metabolism, अग्नि केवल पाचन नहीं है; वह रूपांतरण, विवेक और चयन की शक्ति है — शारीरिक, मानसिक और जैविक तीनों स्तरों पर। मेटाबॉलिज़्म उसे रासायनिक भट्ठी बना देता है। वात, पित्त, कफ— बायोलॉजी अनुवाद: Disease / Syndrome / Humoral imbalance, दोष रोग नहीं हैं, वे गतिशील सिद्धांत हैं। रोग दोषों की विकृति है, दोष स्वयं नहीं। यह अनुवाद पूरी चिकित्सा-दृष्टि को उलट देता है। धातु—रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, शुक्र, बायोलॉजी अनुवाद: Tissues, धातु केवल संरचना नहीं, पोषण की प्रक्रिया है। टिश्यू एक स्थिर वस्तु है, धातु एक सतत प्रवाह। ओजस्—बायोलॉजी अनुवाद: Immunity, ओजस् केवल रोग-प्रतिरोधक शक्ति नहीं, बल्कि जीवन-तेज, स्थैर्य और चेतना का आधार है। Immunity इसे रक्षा-तंत्र तक सीमित कर देती है। आम—बायोलॉजी अनुवाद: Toxins, आम ज़हर नहीं है; वह अपूर्ण पाचन की अवस्था है। Toxin कहना उसे बाहरी ज़हर बना देता है, जबकि वह आंतरिक प्रक्रिया है। शोधन— वमन, विरेचन, बस्ति आदि, बायोलॉजी अनुवाद: Detox, Detox एक फैशन शब्द है। शोधन एक ऋतु, काल, देह और दोष-सापेक्ष चिकित्सा है, कोई साधारण सफ़ाई नहीं। प्रकृति— वात/पित्त/कफ प्रकृति, बायोलॉजी अनुवाद: Body type / Genetic makeup, प्रकृति केवल शरीर-प्रकार नहीं, बल्कि जीवन-प्रवृत्ति है — मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक। विकृति—बायोलॉजी अनुवाद: Pathology,विकृति का अर्थ है संतुलन से विचलन, न कि केवल रोगात्मक संरचना। नाड़ी परीक्षा—बायोलॉजी अनुवाद: Pulse rate, नाड़ी केवल धड़कन नहीं, बल्कि दोषों की गति का संकेत है। Pulse rate इसे घड़ी की सुई बना देता है। चिकित्सा—बायोलॉजी अनुवाद: Treatment—Treatment रोग पर है, चिकित्सा रोगी पर। स्वास्थ्य—बायोलॉजी अनुवाद: Absence of disease, स्वास्थ्य संतुलन है, रोग-शून्यता नहीं।
यह सूची सिद्ध करती है कि आयुर्वेद को अनुवाद के माध्यम से नहीं समझाया गया, बल्कि बदला गया है। जब भाषा बदली जाती है, तो केवल शब्द नहीं बदलते —पूरा दर्शन बदल जाता है। और जब दर्शन बदल जाता है,तो जो बचता है, वह आयुर्वेद नहीं —उसका एलोपैथिक अनुवाद होता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि आयुर्वेद क्यों कमजोर दिखता है। प्रश्न यह है कि आयुर्वेद को जानबूझकर कमजोर क्यों किया गया। जब प्रवेश की योग्यता ही गलत होगी, जब भाषा को बाधा माना जाएगा, और जब अध्ययन की दृष्टि हीनता-बोध से भरी होगी — तब आयुर्वेद जीवित कैसे रहेगा? जो आज पढ़ाया जा रहा है, वह आयुर्वेद का नामधारी ढाँचा है, न कि उसका जीवंत स्वरूप। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं है कि संस्कृत से कटे हुए छात्र द्वारा पढ़ा गया आयुर्वेद, आयुर्वेद नहीं — उसका विकृत संस्करण है।
